बिखरते गाँव

 
    "जेठ की चढती दोपहरी में खेतों  में

   काम करने वाले भी अब गीत

   नहीं गाते हैं। ...कुछ दिनों के बाद

   कोयल भी कूकना भूल जायेगी क्या?"   

                        -फणीश्वर नाथ रेणु

 
     
 
यही कोई ३० - 3 साल पुरानी बात होगी. एक एक चीजें जेहन में चमकते शीशे की तरह साफ़ हैं. गर्मियों की छुट्टियों में गांव जाने का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार रहता था. रेलगाड़ी से नीचे उतरते ही कतार में खड़े तांगों का हुजूम मिलता था अम्मा बाबूजी को एक शांत घोड़े वाले ताँगे में बैठने की हिदायत देती थीं रास्ता कहीं कहीं पर ऊँचा नीचा था एक बार एक घोड़ा बिदक गया था दोनों पैरों पर खड़ा क्या हुआ सारी सवारियां उलट पुलट कर जमीं चाटने लगी थीं वो आठ किलोमीटर का रास्ता करीब करीब दो घंटे में कटता था बसें तो दो ही थीं सुबह सुबह चली जाती थीं खचखच भरी हुई

सड़क के दोनों ओर फैले आम और जामुन के गदराये हुए पेड़ों की महक मन में घर कर जाती थी बांस के झुर्मुटों से चिड़ियों के चहचहाने की आवाज, ऊंचे घने पेड़ों में छिपे कोयल की ऊंची ऊंची कूकें, इधर उधर खेतों में फैले गाय भैसों की घंटियाँ, देर से
उठे मुर्गे की बांग.... शहर की तंग गलियों और शोर शराबे से दूर वो दुनिया ही अलग थी रास्ते में कुछ गांव पड़ते थे और एक बाज़ार भी गावों के कुछ कच्चे कुछ पक्के घर और उनके खपरैल की ढलुवादर छत जिनके कोनों पर छोटे छोटे खपरैल के बुर्ज होते थे, बड़े अच्छे लगते थे इधर उधर छप्पर के छोटे छोटे घर भी दिखाई पड़ते थे बाज़ार में मिठाई की दुकानों में इमरतियाँ सजा कर रखी होती थीं कुम्हार की दुकान के आगे छोटे ड़े घड़े रखे होते थे मन्दिर के पास एक दुकान में 'डॉक्टर बाबू' दरबार फरमाते थे

कुछ दूर बाद तांगा पक्की सड़क छोड़ कर कच्चे रास्ते पर मुड़ जाता था
टेंढ़ा मे़ढ़ा रास्ता जब बगिया से हो कर गुजरता था, मवेशियों के झुंड के साथ खेल कूद में मगन निकर पहने बच्चे मिल ही जाते थे अब हम भी तो शहर से आए कुछ अनोखे लोग होते थे सो कुछ ठिठक कर देखने लग जाते थे और कुछ ताँगे के साथ साथ थोड़ी दूर दौड़ते थे चटकदार साड़ियां पहने महिलाएं सर के पल्लू को दांतों से एक तरफ़ दबाये हमारे गंतव्य स्थल का अनुमान गाती थीं

घर पहुँच कर तो बड़ी खातिरदारी होती थी बड़े से थाल में सबके पैर धुले जाते थे. गन्ने का ताज़ा ताज़ा रस निकल कर लाया जाता था ड़े लोग आप बीती में मगन हो जाते थे तो बच्चे ढेर सारे भाई बहनों के साथ लंबे लंबे बरामदों से लेकर काली माई के चौरे तक उछल कूद में व्यस्त दोपहर ढलते ही आम की बगिया, पश्चिम का पोखरा, विशाल सरसराते पीपल के पेड़ के नीचे बनी ऊंची गोल मड़इया... सबकी सैर शुरू हो जाती थी

गांव में कई वर्ग के लोग रहते थे जहाँ आर्थिक रूप से सम्पन्न लोंगों के लंबे चौड़े घर होते थे, कुछ लोग तो छप्पर से ढकी एक मिटटी की कोठरी में ही रहते थे पर एक बात जरूर थी गांव के गली कूचों में, बाग़ बगीचों में कहीं गन्दगी का नमो निशान भी था बड़ी बड़ी
बैठकें लगती थीं स्थानीय समस्याओं के समाधान  स लेकर ताश के पत्तों के खेल बड़े समारोह के साथ संपन्न होते थे

आप कहीं ये तो नहीं सोचने लगे की मैं विकास का पहिया उल्टा चलाना चाहता हूँ? क्योकि बड़ा फर्क गया है अब गांवों में इधर उधर बन गयी तारकोल की सड़कों पर ताँगों और बैलगाड़ियों की जगह जीप और टाटा सूमो फर्राटे से दौड़ने लगीं हैं गाय बैलों की की घंटियों की जगह सुनाई पड़ती हैं मोटरसाईकिल की हुर्र हुर्र और मोबाइल फ़ोन की टुर्र टुर्र बड़े बड़े घरों की जगहें ले ली है दो-तीन कमरों के बने छोटे छोटे ईंटो की आकृतियों ने  जिनमे कोई आँगन होता है ही कोई बरामदा मेल मिलाप की जगह ले ली हैं टेलिविज़न ने जो ऐसे कार्यक्रम पेश करते हैं जिनका गांव की वास्तविकता से कोई सम्बन्ध ही नहीं होता कामगार अपने गांव के खेत खलिहान में काम करना छोड़ र शहर
ों की झोपड़पट्टियों में जा कर बस गएँ हैं और वहां से आते हैं बड़ी बड़ी बातें ले कर कुछ तो अपनी पोटली में एड्स भी बाँध कर ले आते हैं छोकरे जो गाँवों में बैलगाड़ी हांकते थे, हाइवे पर बड़ी बड़ी गाड़ियाँ चलाते चलाते काल के गाल में समा जाते हैं। गरीब जो दो जून की रोटी की चिंता करते थे, अब मोबाइल रिचार्ज कराने के तनाव में रहते हैं। गांव के पोखरे-तालाब सूख गए हैं बाग़ बगीचों ें झाड़ झंखाड़ और  ऊंची ऊंच घासें   उग आयीं हैं गली कूंचों में जगह जगह पोलीथीन, तम्बाकू के गुटखों के रैपर और गन्दगी पड़ी रहती है जगह जगह देशी शराब के ठेके उग आए हैं. चौपालों और बैठकों में देश की सड़ी हुई राजनीति की गंध आने लगी है घर घर में बंटवारे ने बड़े बड़े किसानों की संतानों को पिद्दी बना दिया है भाई भाई से इज्जत से बात नहीं करना चाहता, शहर से आए मेहमानों को कौन पूछता है?

-उमा शंकर पाण्डेय

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